सिंधु घाटी सभ्यता विश्व की प्राचीनतम और सर्वाधिक विकसित नगरीय सभ्यताओं में से एक थी। इसके नगर-नियोजन में वैज्ञानिक सोच, तकनीकी दक्षता और सामाजिक संगठन की स्पष्ट झलक मिलती है।
सिंधु घाटी सभ्यता का नगरीय स्वरूप
सिंधु घाटी सभ्यता (लगभग 2600–1900 ई.पू.) का विकास उत्तर-पश्चिमी भारतीय उपमहाद्वीप में हुआ। इसके प्रमुख नगरों में मोहनजोदड़ो, हड़प्पा, धौलावीरा और लोथल शामिल थे। इन नगरों की खुदाई से यह स्पष्ट होता है कि यहाँ सुनियोजित शहरी जीवन विकसित हो चुका था।
आयताकार ग्रिड प्रणाली
सिंधु सभ्यता की नगरीय व्यवस्था आयताकार ग्रिड प्रणाली पर आधारित थी।
नगरों की सड़कें उत्तर-दक्षिण और पूर्व-पश्चिम दिशा में थीं।
ये सड़कें एक-दूसरे को समकोण पर काटती थीं।
मुख्य सड़कें चौड़ी थीं, जबकि उनसे जुड़ी गलियाँ अपेक्षाकृत संकरी होती थीं।
यह प्रणाली आधुनिक नगर-नियोजन के सिद्धांतों से अत्यधिक मेल खाती है और सभ्यता की उन्नत योजना क्षमता को दर्शाती है।
भवनों के प्रकार और निर्माण तकनीक
सिंधु सभ्यता के लोगों ने मुख्यतः तीन प्रकार के भवनों का निर्माण किया—
निवास-गृह
स्तम्भों वाले बड़े हॉल
सार्वजनिक स्नानागार
भवन निश्चित आकार की पकी हुई ईंटों से निर्मित किए जाते थे। ईंटों का प्रचलित अनुपात 4:2:1 था, जो मानकीकरण (standardization) को दर्शाता है। इमारतों में पत्थर और लकड़ी के प्रयोग के प्रमाण भी मिले हैं। कई भवनों में सीढ़ियाँ पाई गई हैं, जिससे दो-मंज़िले भवनों के अस्तित्व की पुष्टि होती है।
जलापूर्ति व्यवस्था
नगरीय आवासों में जलापूर्ति की व्यवस्था अत्यंत उन्नत थी।
अधिकांश घरों में निजी कुएँ या सार्वजनिक कुओं की सुविधा थी।
स्नान और घरेलू उपयोग के लिए पर्याप्त जल उपलब्ध कराया जाता था।
यह व्यवस्था बताती है कि स्वच्छता और दैनिक जीवन की आवश्यकताओं को विशेष महत्व दिया जाता था।
उन्नत जल-निकासी और सीवरेज प्रणाली
सिंधु घाटी सभ्यता की सबसे बड़ी विशेषताओं में इसकी अत्याधुनिक जल-निकासी प्रणाली शामिल है।
नगरों में ढकी हुई नालियाँ बनाई गई थीं।
नियमित अंतराल पर मेनहोल की व्यवस्था थी ताकि सफाई की जा सके।
प्रयुक्त जल को घरों से बाहर निकालकर मुख्य नालियों में प्रवाहित किया जाता था।
यह प्रणाली समकालीन विश्व की किसी भी सभ्यता से कहीं अधिक विकसित मानी जाती है।
नगरों का विभाजन : गढ़ी और निचला नगर
सामान्यतः सिंधु नगर दो भागों में विभाजित थे—
गढ़ी अथवा दुर्ग क्षेत्र
निचला नगर
गढ़ी क्षेत्र अपेक्षाकृत ऊँचाई पर स्थित होता था और यहाँ महत्वपूर्ण सार्वजनिक भवन पाए जाते हैं। निचले नगर में सामान्य जनता के आवास होते थे। हालांकि, धौलावीरा इसका अपवाद है, जहाँ नगर तीन भागों में विभाजित था।
गढ़ी/दुर्ग क्षेत्र का उद्देश्य
गढ़ी क्षेत्र को लेकर विद्वानों में मतभेद हैं।
कुछ विद्वान इसे कुलीन वर्ग की बस्ती मानते हैं।
कुछ के अनुसार, इसकी चारदीवारी का उद्देश्य सुरक्षा था।
अन्य मत यह है कि इन प्राचीरों का उपयोग बाढ़ के पानी को नियंत्रित करने के लिए किया जाता था।
अब तक इस विषय पर कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला जा सका है।
अन्नागार (Granaries)
अन्नागार सिंधु सभ्यता की एक महत्वपूर्ण संरचना थी।
यह प्रायः गढ़ी या दुर्ग क्षेत्र में स्थित होता था।
इसमें वायु-निकासी की वैज्ञानिक व्यवस्था थी ताकि अनाज सुरक्षित रहे।
फसल दावने के लिए चबूतरे भी बनाए गए थे।
यह व्यवस्था कृषि उत्पादन, भंडारण और वितरण की संगठित प्रणाली को दर्शाती है।
विशाल स्नानागार, मोहनजोदड़ो (The Great Bath)
मोहनजोदड़ो का विशाल स्नानागार सिंधु सभ्यता की सबसे प्रसिद्ध संरचना है।
इसका फर्श पकी हुई ईंटों से बना था और जलरोधक तकनीक का प्रयोग किया गया था।
पास में स्थित एक विशाल कुएँ से जल भरकर हौज़ में डाला जाता था।
उत्तर और दक्षिण दिशा में सीढ़ियाँ थीं तथा प्रयुक्त जल की निकासी की समुचित व्यवस्था थी।
विद्वानों के अनुसार, इसका उपयोग संभवतः सार्वजनिक धार्मिक अनुष्ठानों या पवित्र स्नान के लिए किया जाता था।
सभाभवन और सामाजिक जीवन
मोहनजोदड़ो से एक सभाभवन के अवशेष मिले हैं, जिसकी छत लगभग 20 स्तम्भों पर आधारित थी। संभवतः यहाँ धार्मिक या सामाजिक सभाएँ आयोजित की जाती थीं। इसके निकट एक पुरोहित आवास भी मिला है, जिसे अर्नेस्ट मैके ने विशिष्ट व्यक्तियों के निवास से जोड़ा है।
आर्थिक और सामाजिक विशेषताएँ
अधिकांश नगरवासी व्यापारी या कारीगर थे।
समान व्यवसाय करने वाले लोग एक ही क्षेत्र में निवास करते थे।
कपास और ऊन की कताई-बुनाई अत्यंत प्रचलित थी।
मंदिर स्थापत्य का अभाव
सिंधु घाटी सभ्यता के किसी भी नगर से अब तक स्पष्ट मंदिर स्थापत्य के प्रमाण नहीं मिले हैं। इससे यह अनुमान लगाया जाता है कि धार्मिक गतिविधियाँ संभवतः सार्वजनिक स्नानागार या घरेलू स्तर पर संपन्न होती थीं।
उपसंहार
सिंधु घाटी सभ्यता का नगर-नियोजन अपनी वैज्ञानिक दृष्टि, स्वच्छता, मानकीकरण और सामाजिक संगठन के कारण अद्वितीय था। यह स्पष्ट करता है कि प्राचीन भारत में आर्यों के आगमन से पूर्व ही एक अत्यंत विकसित नगरीय संस्कृति विद्यमान थी, जिसकी छाप आज भी आधुनिक शहरी योजनाओं में देखी जा सकती है।






