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प्राचीन भारतीय इतिहास के श्रोत

प्राचीन भारतीय इतिहास के श्रोत


मुख्य रुप से प्राचीन भारतीय इतिहास के श्रोतो को दो भागो में वर्गीकृत किया है -\
साहित्यिक श्रोत  
पुरातत्वीय श्रोत      
साहित्यिक  श्रोतों  के अन्तर्गत  वैदिक , संस्कृत, पालि, प्राकृत एवं विदेशी साहित्य को शामिल किया जाता है। पुरातात्विक श्रोतों के अन्तर्गत पुरालेखो, सिक्को, स्थापत्य अवशेषो, पुरात्वीय अन्वेषण एवं उत्खनन शामिल है।
   
साहित्यिक श्रोत -

प्राचीन भारतीय साहित्य अधिकांशतः धार्मिक रूप में है जिनमें ऐतिहासिक तथ्यों का अभाव है क्योंकि इसमें किसी घटनाक्रम  एवं राजाओं की  निश्चित तिथि नही दी गयी है फिर भी हमें इनसे बहुत सी जानकारियां मिलती है।

 वैदिक साहित्य

 वैदिक साहित्य के अन्तर्गत मुख्यतः चार वेदों के अलावा ब्राह्मणों, आरण्यकों और उपनिषदों को शामिल किया जाता है।
           वेद-    वेदों की संख्या चार है- ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद । इन चार वेदों को संहिता कहते है। वेदों की भाषा को वैदिक भाषा कहा जाता है। वेदों के रचयिता महर्षि कृष्ण दैपायन वेदव्यास को माना जाता है।

ऋग्वेद :
सबसे प्राचीन वेद ऋग्वेद है। पंडित बाल गंगाधर तिलक ऋग्वेद के प्राचीनतम अंश को 6000 ईसा पूर्व का मानते है । ऋिक का अर्थ है छंदों एवं चरणों से युक्त मंत्र ।  इसमें कुल 10 मंडल तथा 10462 सूक्त है। इन 10 मंडलों में से 2 से 7 तक प्राचीन माने जाते है । ऋग्वेद में तीन पाठ मिलते है-
      साकल  पाठ ( इसमें 1017 मंत्र है)
      वालखिल्य पाठ ( इसमें कुल 11 मंत्र है)
      वाष्कल पाठ (इसमें 56 मंत्र है)
ऋग्वेद की ऋचाओं को पढ़ने वाले ऋषि को होतृ कहते है ।
ऋग्वेद के तीसरे मंडल में  सूर्य देवता  (सावित्री) को समर्पित प्रसिद्ध गायत्री मंत्र है।
इसके नवें मंडल में सोम देवता का उल्लेख है।
ऋग्वेद के दसवें मंडल के पुरुष सूक्त में चतुष्यवर्ण समाज का उल्लेख है।
वामन अवतार के तीन पगो का उल्लेख ऋग्वेद में है।
ऋग्वेद में इन्द्र के लिए 250 तथा अग्नि के लिए 200 मंत्र का उल्लेख है।
यजुर्वेद
यजु का अर्थ होता है ' यज्ञ ' इसमें यज्ञो के नियमो तथा विधि-विधानो का संकलन मिलता है। सस्वर पाठ के लिए मंत्रो तथा बलि के समय अनुपालन के लिए नियमों का संग्रह यजुर्वेद कहलाता है। इसके पाठ कर्ता को अध्वर्यु कहते है। यह गद्य एवं पद्य दोनो में है। यजुर्वेद के दो भाग है - शुक्ल यजुर्वेद तथा कृष्ण यजुर्वेद । शुक्ल यजुर्वेद को वाजसनेयी  संहिता के नाम से जाना जाता है । यजुर्वेद कर्मकाण्ड प्रधान है । यह पांच शाखाओं में विभक्त है -
1. काठक 2. कपिष्ठल 3. मैत्रायणी 4. तैतिरिय 5.वाजसनेयी ।

सामवेद

साम का शाब्दिक अर्थ है ' गान ' इसमें मुख्यत: यज्ञों के अवसर पर गाये जाने वाले गीतो का संग्रह है। सामवेद में मुख्यत: सूर्य की स्तुति के मंत्र है। इसे भारतीय संगीत का मूल कहा जा सकता है। इसके पाठ कर्ता को  उद्रातृ कहा जाता है।

अथर्ववेद

यह सबसे बाद का वेद है। इसमें कुल 731 मंत्र तथा 6000 पद्य है। अथर्ववेद में सामान्य मनुष्य के विचारो एवं अंधविश्वासों का विवरण मिलता है। अथर्वा ऋषि को इसका रचयिता माना जाता है। इसमें रोग, निवारण, तंत्र- मंत्र, जादू- टोना, शाप,वशीकरण, आशीर्वाद, स्तुति, प्रायश्चित, औषधि, अनुसंधान, विवाह, प्रेम, राजकर्म आदि विषयों से संबंधित मंत्र का उल्लेख है।
अथर्ववेद कन्याओ के जन्म की निन्दा करता है।
इसमें सभा एवं समिति को प्रजापति की दो पुत्रियां कहा गया है।

वेदांग

वेदों को भलीभांति से समझने के लिए वेदांगो की रचन
 हुई । वेदांग का शाब्दिक अर्थ है वेद तथा अंग अर्थात वेदों  का अंग । ये वेदों के शुद्ध उच्चारण तथा यज्ञादि करने में सहायक थे ।  ये संख्या में छ: है जो इस प्रकार है- 

  1. शिक्षा ( स्वर विज्ञान)
  2. ज्योतिष ( खगोल विज्ञान)
  3. कल्प ( कर्म - कांड )
  4. व्याकरण
  5. निरुक्त ( व्युत्पत्ति विज्ञान)
  6. छंद 


सूत्र

वैदिक साहित्य को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए सूत्र साहित्य का विकास हुआ। प्रत्येक वेदांग के बारे में विश्वसनीय साहित्य सूत्रों के रूप में विकसित है। सूत्र गद्य में अभिव्यक्ति का बहुत ही यथार्थ एवं सुनिश्चित माध्यम हैं। संस्कृत के महान वैयाकरण पाणिनि की पुस्तक अष्ठाध्यायी ( 8 अध्याय) सूत्रों में लिखने की कला का अद्वितीय उदाहरण है। ऐसे सूत्र जिनमें विधि एवं नियमों  का प्रतिपादन किया जाता है कल्पसूत्र कहा जाता हैं कल्पसुत्रो के  तीन भाग  है -
1. स्रोत सूत्र ( यज्ञ संबंधी नियम)
2. गृह सूत्र ( लौकिक एवं पारलौकिक कर्तव्यो का वर्णन)
3. धर्म सूत्र ( धार्मिक, सामाजिक एवं राजनीतिक कर्तव्यों का उल्लेख )
सूत्र साहित्य में 8 प्रकार के विवाहों का उल्लेख मिलता हैं।

ब्राह्मण, आरण्यक, तथा उपनिषद

ब्राह्मण, आरण्यक तथा उपनिषद को उत्तरवर्ती  वैदिक साहित्य कहा जाता है।
ब्राह्मण
ब्राहाम्ण ग्रन्थ वैदिक साहित्य की व्याख्या करने के लिए गद्य में लिखे गये है। प्रत्येक संहिता के लिए अलग-अलग ब्राह्मण ग्रन्थ है। जैसे-
 ऋग्वेद के लिए ऐतरेय तथा कौषीतकी,
 यजुर्वेद के तैतिरीय तथा शतपथ,
 सामवेद के लिए पंचविश तथा
 अथर्ववेद के लिए गोपथ
इन ब्रहामण ग्रंथो में वैदिक कर्मकाण्ड का विस्तारपूर्वक निरूपण किया गया है।

आरण्यक
जंगल में पढ़े जाने के कारण इसे आरण्यक कहते है। आरण्यक में दार्शनिक एवं रहस्यात्मक बातो का वर्णन किया गया है। इसमें कोर यज्ञवाद के स्थान पर चिंतनशील ज्ञान के पक्ष में अधिक जोर दिया गया है।  कुल उपलब्ध आरण्यको की संख्या सात है जो इस प्रकार है--
1. ऐतरेय 2. शाखायन 2. तैतीरिय 3. मैत्रायणी 4. माध्यन्दिन वृहदारण्यक 5. तल्वकार 7. छान्दोग्य

उपनिषद

उप का अर्थ है ' समीप ' और निषद का अर्थ है ' बैठना ' अर्थात जिस ज्ञान को गुरु के पास बैठकर प्राप्त किया जाता है उसे उपनिषद कहते है। इसे पराविद्या या आध्यात्म विद्या भी कहते है। उपनिषद वैदिक साहित्य के अंतिम भाग होने के कारण इन्हें वेदांत भी कहा जाता है।भारत का आदर्श वाक्य  ' सत्यमेव जयते ' मुण्डकोपनिषद से लिया गया है। उपनिषदों की कुल संख्या 108 मानी गयी है इनमें प्रमुख हैं - ईश, केन, कठ,प्रश्न, मुण्डक, मांडूक्य, तैतीरीय, ऐतरेय इत्यादि।

महाकाव्य

वैदिक साहित्य के बाद महाभारत एवं रामायण दो महत्वपूर्ण महाकाव्य है। महाभारत एवं रामायण कि रचना दूसरी से चौथी शताब्दी ईसा पूर्व हुआ होगा।

रामायण
रामायण की रचना महर्षि वाल्मिकी ने की थी ।इसमें मुख्यत: 6000 श्लोक थे जो बाद में बढ़कर 12000 श्लोक हो गए पर अंततः इसमें 24000 श्लोक हो गए । रामायण में हिन्दुओं , यवनों और शकों के संघर्ष का विवरण प्राप्त होता है। रामायण से हमें प्राचीन भारत वर्ष की सामाजिक धार्मिक एवं राजनीतिक दशा का पता चलता है।

महाभारत

महाभारत की रचना वेद व्यास ने की थी।मूल रूप से इसमें 8800 श्लोक थे तथा इसका नाम जयसंहिता था। बाद में श्लोकों की संख्या 24000 हो गया तथा इसका नाम भारत हो गया क्योकि इसमें प्राचीनतम वैदिक जन भरत के वंशजों की कथा है। इसका प्रारम्भिक उल्लेख आश्वलयन गृहसुत्र में मिलता है।
एक लाख श्लोक होने की वजह से इसे शत साहशत्री संहिता भी कहा जाता है।
महाभारत में शक, यवन, पारसिक, हूण आदि जातियो का उल्लेख मिलता है। महाभारत से हमें उस समय की सामाजिक आर्थिक दशा का पता चलता है।

पुराण

पुराण ऐतिहासिक विवरण है इनकी संख्या 18 है। इनकी रचना तीसरी से चौथी शताब्दी के मध्य हुई है। 
अमरकोश में पुराणों के पांच विषय वस्तु बताए गए है। ये है :-  (i) सर्ग(सृष्टि की उत्पत्ति) (ii) प्रतिसर्ग (सृष्टि का प्रत्यावर्तन एवं प्रति विकास )  (iii) मन्वंतर  ( समय की पुनरावृति) (iv) वंश ( राजाओं एवं ऋषिओ की बंशावली) (v)   वंशानुचरित (कुछ चुने हुए पात्रो की जीवनियां)





          

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