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सिंधु घाटी सभ्यता की मूर्तिकला (Sculpture)

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सिंधु घाटी सभ्यता की मूर्तिकला (Sculpture)






सिंधु घाटी सभ्यता की मूर्तिकला तत्कालीन समाज की तकनीकी दक्षता, कलात्मक अभिरुचि और धार्मिक-सांस्कृतिक जीवन को समझने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। इस काल में प्रस्तर, धातु और मिट्टी से निर्मित मूर्तियाँ प्राप्त होती हैं, जो विकसित शिल्प-परंपरा की साक्षी हैं।

मूर्तिकला का सामान्य परिचय

सिंधु घाटी सभ्यता (लगभग 2600–1900 ई.पू.) की मूर्तिकला के अंतर्गत प्रस्तर, धातु (विशेषतः कांसा और तांबा) तथा मिट्टी (मृण्मूर्ति/टेराकोटा) से बनी मूर्तियों का उल्लेख किया जाता है। प्रस्तर और धातु की उत्कृष्ट मूर्तियाँ तत्कालीन तकनीकी प्रगति और धातुकर्म ज्ञान को दर्शाती हैं, जबकि मृण्मूर्तियाँ जनसामान्य के धार्मिक और दैनिक जीवन की झलक प्रस्तुत करती हैं।
2. प्रस्तर मूर्तियाँ (Stone Sculptures)
2.1 प्रमुख विशेषताएँ
हड़प्पा और मोहनजोदड़ो से प्राप्त प्रस्तर मूर्तियाँ त्रि-आयामी हैं।
ये मूर्तियाँ बैठी हुई (आसन मुद्रा) तथा खड़ी (स्थानक मुद्रा)—दोनों रूपों में मिलती हैं।
प्रस्तर मूर्तियों में दो प्रमुख पुरुष आकृतियाँ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं—
लाल बलुआ पत्थर से बनी धड़-प्रतिमा,
सेलखड़ी से निर्मित दाढ़ी युक्त आवक्ष प्रतिमा।

 कलात्मक विविधता

सेलखड़ी (Alabaster) से निर्मित एक मूर्ति पारदर्शी वस्त्र धारण किए हुए मिली है, जो वस्त्र-निर्माण और सौंदर्यबोध का संकेत देती है।
प्रस्तर की बनी पशु-मूर्तियाँ भी प्राप्त हुई हैं।
चूना-पत्थर से निर्मित भेड़ और हाथी की संयुक्त (Composite) मूर्ति कलात्मक दृष्टि से अत्यंत उल्लेखनीय है, जिसमें शरीर और सींग भेड़ के तथा सूँड़ हाथी की दर्शाई गई है।

 तकनीकी पक्ष

हड़प्पा से प्राप्त कुछ प्रस्तर मूर्तियों में गर्दन और कंधों पर छेद मिले हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि इनके सिर और हाथ अलग से जोड़कर लगाए गए थे। यह शिल्प में उन्नत तकनीक और योजनाबद्ध निर्माण को दर्शाता है।

धातु मूर्तियाँ (Metal Sculptures)

सामान्य परिचय

सिंधु सभ्यता के विभिन्न स्थलों से धातु की मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं। इस सभ्यता के मूर्तिकार धातुओं को पिघलाने और दो भिन्न धातुओं को मिलाकर मिश्रधातु बनाने की कला में दक्ष थे। ताँबा और टिन को मिलाकर कांसा तैयार किया जाता था।

ढलाई तकनीक

हड़प्पा सभ्यता में कांसे की ढलाई की कला व्यापक रूप से प्रचलित थी।
ढलाई के लिए मधुच्छिष्ट विधि अथवा लुप्त-मोम तकनीक (Lost-wax Technique) का प्रयोग किया जाता था।
इस विधि में पहले मोम की आकृति बनाकर उस पर मिट्टी की परत चढ़ाई जाती थी, फिर गर्म करने पर मोम पिघलकर बाहर निकल जाता था और बने खोखले सांचे में द्रवित धातु डाली जाती थी।

 मानव और पशु आकृतियाँ

कांसे से बनी मूर्तियों में मानव के साथ-साथ पशु आकृतियाँ भी प्राप्त होती हैं।
मोहनजोदड़ो से प्राप्त नर्तकी (Dancing Girl) की कांस्य मूर्ति इस कला का सर्वोत्तम उदाहरण मानी जाती है।
कांसे की पशु-मूर्तियों में उठे हुए सिर, पीठ (कूबड़) और भारी सींग वाले भैंसे तथा भेड़ की आकृतियाँ कलात्मक दृष्टि से अत्यंत उत्कृष्ट हैं।
इसके अतिरिक्त, कालीबंगा से प्राप्त ताँबे की वृषभ मूर्ति अद्वितीय है। बैल, कुत्ता, खरगोश और चिड़ियों की ताँबे की मूर्तियाँ भी मिली हैं।
कालीबंगा और दायमाबाद से सांचों में ढली मूर्तियों के उत्कृष्ट नमूने प्राप्त हुए हैं।

मृण्मूर्ति कला (Terracotta Art)

निर्माण विधि

मृण्मूर्तियाँ (टेराकोटा) आग में पकी हुई मिट्टी से निर्मित हस्तनिर्मित मूर्तियाँ हैं। इनके निर्माण में मुख्यतः सपिंचिंग विधि (Pinching Method) का प्रयोग किया गया।

 स्वरूप और विषय

सिंधु घाटी सभ्यता के लोगों ने बड़ी संख्या में मिट्टी की मूर्तियाँ बनाई, परंतु प्रस्तर और कांस्य मूर्तियों की तुलना में इनका शिल्प अपेक्षाकृत अपरिष्कृत प्रतीत होता है।
गुजरात के कई स्थलों और कालीबंगा से प्राप्त मृण्मूर्तियाँ यथार्थता के अधिक निकट हैं।
प्रमुख उदाहरणों में मातृदेवी, पहियों वाली खिलौना गाड़ी, सीटियाँ, पक्षी और पशुओं की मूर्तियाँ शामिल हैं।
4.3 सांस्कृतिक महत्व
मृण्मूर्तियाँ जनसामान्य की धार्मिक मान्यताओं, खेल-खिलौनों और घरेलू जीवन को प्रतिबिंबित करती हैं। मातृदेवी की मूर्तियाँ उर्वरता और मातृत्व से जुड़े विश्वासों की ओर संकेत करती हैं।
5. निष्कर्ष
सिंधु घाटी सभ्यता की मूर्तिकला बहुआयामी और तकनीकी रूप से उन्नत थी। प्रस्तर मूर्तियाँ शिल्प-कौशल, धातु मूर्तियाँ धातुकर्म और तकनीकी दक्षता, जबकि मृण्मूर्तियाँ सामाजिक और धार्मिक जीवन को समझने में सहायक हैं। समग्र रूप से यह मूर्तिकला न केवल प्राचीन भारतीय कला की समृद्ध परंपरा को दर्शाती है, बल्कि विश्व की प्राचीनतम शहरी सभ्यताओं में सिंधु घाटी सभ्यता के विशिष्ट स्थान को भी रेखांकित करती है।

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